Mamdani Files: गहराई में छिपी ‘Deep State’ की कहानी

कभी-कभी एक नेता से ज़्यादा, उसकी विचारधारा शासन करती है। और जब विचारधारा ही सत्ता बन जाए, तब “Deep State” जन्म लेता है।



दुनिया भर में एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे ज़ोरान ममदानी केवल न्यूयॉर्क का मेयर नहीं, बल्कि अमेरिका और शायद पूरी दुनिया का “प्रेसिडेंट” बन गया हो। मीडिया और बौद्धिक हलकों में उनके नाम के इर्द-गिर्द एक ऐसी फिनोमिना खड़ी की जा रही है मानो यह किसी बड़े बदलाव की शुरुआत हो।
लेकिन असली सवाल यह है कि यह बदलाव किस दिशा में जा रहा है? और इसके पीछे की विचारधारा क्या कहती है?

किसी भी व्यक्ति को समझने के लिए उसकी विचारधारा का अध्ययन ज़रूरी होता है। ममदानी की सोच को समझने के लिए उनकी किताबें काफी कुछ बताती हैं, खासकर When Victims Become Killers (2001) और Good Muslim, Bad Muslim (2004)।


‘When Victims Become Killers’ - भारत और रवांडा की तुलना

इस किताब में ममदानी ने 1994 के रवांडा नरसंहार पर चर्चा की है। बेल्जियम ने जब रवांडा को उपनिवेश बनाया, तो वहां की आबादी को दो वर्गों में बाँट दिया- हुतू (स्थानीय) और तुत्सी (बाहरी)। आगे चलकर यही विभाजन इतना गहराया कि लाखों लोगों की हत्या हुई।

यहां तक किताब का विश्लेषण समाजशास्त्रीय कहा जा सकता था, लेकिन ममदानी ने इस हिंसा की तुलना भारत के 1947 के विभाजन से की और लिखा कि “हिंदुओं ने मुसलमानों के खिलाफ जेनोसाइड किया।”

यहीं से विवाद शुरू होता है। उन्होंने यह नहीं बताया कि विभाजन में हिंदू और सिख समुदाय के लाखों लोग भी पाकिस्तान से विस्थापित हुए, मारे गए या सब कुछ खो बैठे। इस एकतरफा फ्रेमिंग ने अकादमिक हलकों में “Hindu majoritarianism” और “Hinduphobia” जैसे नैरेटिव को जन्म दिया, जिनका असर आज भी कई शोध और लेखों में दिखता है।


‘Good Muslim, Bad Muslim’- जिन्ना की छवि का पुनर्लेखन

2004 में ममदानी ने Good Muslim, Bad Muslim लिखी, जिसमें उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को “संवैधानिक और सेक्युलर नेता” बताया। उन्होंने लिखा कि जिन्ना एक लोकतांत्रिक पाकिस्तान चाहते थे जहां अल्पसंख्यकों को समान अधिकार मिले।

लेकिन इतिहास कुछ और कहता है। जिन्ना ने दो-राष्ट्र सिद्धांत के तहत यह दावा किया था कि हिंदू और मुसलमान “अलग सभ्यताएं” हैं और साथ नहीं रह सकते। यही जिन्ना 1946 में Direct Action Day की पुकार देकर कोलकाता में हुए हिंदू नरसंहार के लिए ज़िम्मेदार माने गए।

और 1949 में पाकिस्तान की “Objectives Resolution” में लिखा गया- Sovereignty belongs to Allah.”
अगर जिन्ना वास्तव में सेक्युलर होते, तो यह घोषणा शायद कभी न होती। पर ममदानी ने इन पहलुओं को नज़रअंदाज़ कर, जिन्ना की एक सफेद-धोई हुई छवि गढ़ी।


आतंकवाद की ‘राजनीतिक व्याख्या’

ममदानी की सबसे विवादास्पद सोच उनकी आतंकवाद की व्याख्या में दिखाई देती है। वे कहते हैं कि “फिदायीन” यानी आत्मघाती हमलावर भी अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी को “एक बड़े संघर्ष” के लिए समर्पित करता है, इसलिए उसका कदम एक “राजनीतिक प्रतिक्रिया” है, न कि हिंसक अपराध।

यह दृष्टिकोण आतंकवाद को वैध ठहराने जैसा लगता है। ममदानी इस्लामी आतंकवाद को “राजनीतिक प्रतिरोध” के रूप में देखते हैं और हमास को “जस्टिस मूवमेंट” कहकर उसका बचाव करते हैं। उनके मुताबिक, दक्षिण अफ्रीका के apartheid की तरह इज़राइल के “Zionist Entity” का भी “dismantling” होना चाहिए।

यही वह तर्क है जो आज “decolonization” के नाम पर बार-बार दोहराया जाता है, जहां हिंसा को भी न्याय के संघर्ष के रूप में पैकेज किया जाता है।


एक वैश्विक वैचारिक ढांचा

ममदानी की किताबें केवल व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि एक व्यापक बौद्धिक प्रवृत्ति का हिस्सा हैं। यह प्रवृत्ति इतिहास को इस तरह से “reframe” करती है कि पश्चिम की नीतियों या इस्लामी कट्टरवाद की आलोचना एक “औपनिवेशिक प्रतिक्रिया” बन जाए।

इस विचारधारा की भाषा हर जगह लगभग एक जैसी है,
सामाजिक न्याय”, “गरीबी”, “हाशिए के लोग”, “औपनिवेशिक विरासत”, “free housing”, “tax for equality”  ये सब शब्द अलग-अलग देशों में सुनाई देते हैं, लेकिन इनके पीछे की सोच एक जैसी है।
यह वही global intellectual ecosystem है जो हर देश में अलग चेहरे से वही नैरेटिव पेश करता है।


एक विचार नहीं, एक एजेंडा

किसी व्यक्ति को समझने के लिए उसकी रचनाओं को पढ़ना ज़रूरी है, क्योंकि वही उसके विचारों का असली आईना होती हैं। ममदानी की किताबें बताती हैं कि “Mamdani Phenomenon” केवल एक व्यक्ति की लोकप्रियता नहीं, बल्कि एक वैचारिक परियोजना है जहाँ इतिहास, धर्म और राजनीति को नए ढांचे में ढालकर एक वैश्विक एजेंडा आगे बढ़ाया जा रहा है।

अब यह पाठक पर है कि वह इसे “विचार की क्रांति” माने या “Deep State” की अगली चाल।


🟠 पाठक से सवाल

क्या आपको लगता है कि Mamdani Files जैसे नैरेटिव किसी नए वैश्विक एजेंडा का हिस्सा हैं, या ये सिर्फ़ बौद्धिक बहसें हैं जिन्हें ज़रूरत से ज़्यादा महत्व दिया जा रहा है?
अपनी राय कमेंट में ज़रूर बताइए , क्योंकि बहस वहीं से शुरू होती है जहाँ सवाल उठते हैं।



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