डिजिटल युद्ध की चपेट में भारत: विदेशी धरती पर पल रही ‘देशभक्ति’ या साजिश?
सोशल मीडिया के इस दौर में एक चिंताजनक चलन तेजी से उभरा है। विदेशों में बैठे भारतीय मूल के क्रिएटर्स के चैनल बिना किसी ठोस वजह के लाखों-करोड़ों फॉलोअर्स बटोर रहे हैं। क्या यह सिर्फ कंटेंट की गुणवत्ता है, या फिर तकनीकी रूप से कोई बड़ा खेल चल रहा है? जब हम इसे ईरान-इज़राइल-अमेरिका के डिजिटल युद्ध और यूक्रेन के प्रोपगैंडा मॉडल से जोड़कर देखते हैं, तो तस्वीर बेहद भयावह हो जाती है।
प्रभावशाली संख्या: आंकड़े बयां करते हैं डराने वाली कहानी
- जर्मनी से ध्रुव राठी: बर्लिन में रहने वाले इस यूट्यूबर के मुख्य चैनल पर 2.86 करोड़ सब्सक्राइबर हैं, सभी चैनलों को मिलाकर यह संख्या 3.65 करोड़ से अधिक है। टाइम मैगज़ीन द्वारा 'नेक्स्ट जेनरेशन लीडर्स' में शामिल किया जाना उनकी विश्वसनीयता को तो दर्शाता है, लेकिन सवाल यह है: क्या इतनी बड़ी फॉलोइंग केवल कंटेंट से बन सकती है?
- अमेरिका से 'CJP' (कॉकरोच जनता पार्टी): अमेरिका में रहने वाले पूर्व आप (आम आदमी पार्टी) सोशल मीडिया कार्यकर्ता अभिजीत दीपके द्वारा शुरू किया गया यह व्यंग्यात्मक आंदोलन महज 4 दिनों में X पर ट्रेंड करने लगा। इंस्टाग्राम पर इसके 1.5 करोड़ फॉलोअर्स हैं, जो भारत की बड़ी राजनीतिक पार्टियों से भी अधिक है। भारत में इसका X अकाउंट कानूनी कार्रवाई के तहत प्रतिबंधित कर दिया गया।
- सबसे चौंकाने वाला तथ्य: सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों के अनुसार, CJP के कुल फॉलोअर्स में भारत की हिस्सेदारी मात्र 9% थी, जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और तुर्की की हिस्सेदारी 77% थी। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यह आशंकाओं को हवा देने के लिए काफी है।
क्या विदेशी एजेंसियां सोशल मीडिया को हथियार बना रही हैं?
यह कोई नया खेल नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले एक जांच में पाया गया कि पाकिस्तानी अकाउंट्स फेक न्यूज और नफरत फैला रहे थे। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान तो डीपफेक वीडियो और फैब्रिकेटेड एडवाइजरी का खुलासा हुआ। लेकिन अब खतरा सिर्फ पड़ोसियों तक सीमित नहीं है।
पश्चिम एशिया और यूक्रेन: जीते-जागते सबक
- ईरान-इज़राइल टकराव: हाल के ड्रोन-मिसाइल हमलों के साथ-साथ एक अदृश्य डिजिटल युद्ध भी लड़ा गया। हजारों फेक अकाउंट्स, डीपफेक वीडियो और एआई जनरेटेड सामग्री से जनता की राय बदलने की कोशिश की गई। इज़राइल की 'यूनिट 8200', अमेरिकी साइबर कमांड और ईरानी हैकर समूह – सभी के पास सोशल मीडिया एल्गोरिदम में हेरफेर करने की क्षमता है।
- रूस-यूक्रेन युद्ध: इसने साबित कर दिया कि सोशल मीडिया का मैदान असल जंग से कम खतरनाक नहीं है। झूठे वीडियो और सरकारी स्तर पर चलाई गई डिजिटल मुहिमों ने वैश्विक रणनीति बदल दी।
- सवाल यह है: अगर यही तकनीक ईरान-इज़राइल और यूक्रेन में इस्तेमाल हो सकती है, तो क्या यह भारत के खिलाफ नहीं हो सकती? जर्मनी और अमेरिका में बैठे 'भारतीय क्रिएटर्स' के चैनलों पर अचानक आई मिलियन फॉलोअर्स की बाढ़ उसी पैटर्न की ओर इशारा करती है।
'एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे': सिर्फ एक नारा या खतरे की घंटी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान दिया गया "एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे" का नारा इस संदर्भ में बेहद प्रासंगिक हो जाता है।
क्या यह नारा सिर्फ चुनावी जुमला था, या फिर यह सोशल मीडिया के इस नए खतरे – जो ईरान-इज़राइल युद्ध में साफ़ दिखा – की तरफ इशारा था? यह सोचने वाली बात है कि क्या सरकारी एजेंसियों के पास ऐसे इंटेलिजेंस इनपुट हैं, जिनके आधार पर एकजुट रहने की सलाह दी जा रही है।
सतर्क रहें, एक रहें
ध्रुव राठी हो या CJP, इनके अचानक मिलियनों में फॉलोअर्स होने के पीछे कई सवाल हैं। चाहे वह उत्तरी-पूर्वी राज्यों से पकड़े गए कथित मुखबिरों का मामला हो, या फिर सोशल मीडिया पर चल रहे कृत्रिम प्रचार अभियान – यह नया पैटर्न चिंता का विषय है।
यह जरूरी है कि जांच एजेंसियां इन रहस्यमयी फॉलोअर्स के स्रोत का पता लगाएं। क्या यह कोई विदेशी एजेंसी का काम है, या घरेलू सांठगांठ – इसका खुलासा होना ही भारत के डिजिटल भविष्य के लिए सुरक्षित होगा।
जय हिंद। सतर्क रहें, एक रहें।