✍️इतिहास की पुकार
✍️इतिहास की पुकार
भारत की माटी में गूँजती पुरानी कहानियाँ,
सिंधु की लहरों में दबे रक्त की निशानियाँ।
नालंदा की राख, विक्रमशिला की चीखें,
जिनकी गाथाएँ आज भी हवाओं में दिखें।
अपने ही घर में पराये लगे,
इतिहास के पन्ने क्यों इतने सड़े?
किसने मिटाया प्रताप का रथ,
क्यों दबा दीं शिवा की पगचापें शिथिल समय के तले?
तहख़ानों में अब भी शूरवीरों के स्वप्न हैं,
मंदिरों की दीवारों पर सच के चित्र थमे हैं।
मगर पाठ्यपुस्तकें चुप हैं,
भरी हैं परायों के फ़रमानों से,
जहाँ न शिवा हैं, न झाँसी की लौ,
न बलिदानों की कहानी सही से।
क्यों गायी जाती है मुगलों की महिमा इतनी भारी?
क्यों छुपा दी जाती है अपने वीरों की बलिदानी?
इतिहास का दर्पण कब साफ़ होगा?
कब हर भारतीय को उसका अपना इंसाफ़ होगा?
मगर इतिहास कभी मरता नहीं
वो बस कवि की प्रतीक्षा में मौन है कहीं।
उठो ऐ भारत, अपनी गाथा फिर से गाओ,
सदियों की धूल हटाओ, सच को जगाओ।
हर पन्ने में आग हो, हर कण में बल,
क्योंकि भारत की आत्मा अमर है, अटल।
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