लाल किले की वो बात: सिर्फ भाषण नहीं, एक पूरी लड़ाई का ऐलान था
15 अगस्त। लाल किला। प्रधानमंत्री का भाषण।
हर साल हम ताली बजाते हैं, झंडा लहराते हैं और अगले दिन भूल जाते हैं कि क्या बोला गया। लेकिन इस बार कुछ अलग है। सच कहूँ तो, जब मैंने पहली बार भाषण सुना, तो मुझे भी सामान्य लगा। लेकिन जब मैंने शब्दों के पीछे झाँका, तो रोंगटे खड़े हो गए।
वो अदृश्य दुश्मन जिसका नाम था-'मानसिक नक्सलवाद'
मोदी ने इस बार कोई सपाट-सी राजनीतिक बात नहीं कही। उन्होंने उस अदृश्य दुश्मन को नाम दिया, जिसके बारे में हम बात तो करते थे, पर नाम नहीं जानते थे 'मानसिक नक्सलवाद'।
ये वो लोग हैं जिनके हाथों में AK-47 नहीं हैं, लेकिन जो AK-47 उठाने वालों के लिए कानूनी और बौद्धिक ढाल बनते हैं। ये वो तबका है जो भारत की मिट्टी पर बैठकर भारत के संसाधन खाता है, और फिर उसी देश के खिलाफ नैरेटिव गढ़ता है। सबसे दिलचस्प बात ये है कि इस बार सरकार ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी है। पहले जो दुश्मन सिर्फ जंगलों में छिपा होता था, अब उसका दिमाग शहरों के AC कमरों में बैठा है और सरकार ने उसे पहचान लिया है।
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| डिजिटल जाल बनाम निर्णायक मास्टरस्ट्रोक। |
शल्य का वो किरदार जो आज भी ज़िंदा है
सोचिए, महाभारत का वह किरदार-शल्य। वह कर्ण का सारथी तो बना, पर उसका काम रथ चलाना नहीं था। उसका काम था हर पल कर्ण के कान में यह बोलना कि "तू हारेगा, तेरी ताकत कम है, तेरा विरोधी अजेय है।" बिना तलवार चलाए, शल्य ने कर्ण के मनोबल को मार दिया।
आज हमारे अकादमिक जगत, मीडिया के कमरों, एनजीओ के दफ्तरों और सोशल मीडिया के एल्गोरिदम में बैठे ये 'शल्य' ठीक यही कर रहे हैं। जब भारत कोई उपलब्धि हासिल करता है, तो ये लोग पहले उसे कमतर दिखाने में लग जाते हैं। लेकिन इस बार सरकार ने इन्हें पहचान लिया है और पूरी ताकत से इनके सामने खड़ी हो गई है।
डिजिटल संप्रभुता-अब कोई मज़ाक नहीं
आपको पता है, जब कुछ बड़ी टेक कंपनियों ने भारत के खिलाफ गलत नैरेटिव फैलाने की कोशिश की, तो इस बार सरकार ने ढुलमुल रवैया नहीं अपनाया। उनके सबसे बड़े अधिकारियों को भारत आकर लिखित में सफाई देनी पड़ी, माफी माँगनी पड़ी। ये पहले कभी नहीं हुआ था। ये संकेत है कि डिजिटल संप्रभुता को लेकर भारत अब कोई मज़ाक नहीं करवाने वाला। सरकार ने साफ कर दिया है-चाहे वो कोई टेक दिग्गज हो या कोई बड़ा मीडिया घराना, अगर भारत के खिलाफ गलत बात फैलाएगा, तो उसे जवाब देना होगा।
कड़वा सच-जितना शानदार विज़न, उतना ही भारी सिस्टम
लेकिन कड़वा सच ये है कि जितना शानदार ये विज़न है, उतना ही निराशाजनक इसका क्रियान्वयन है।
चाणक्य ने तीन तरह के लोग बताए थे-एक जो इशारे पर काम समझ जाए, दूसरा जो साफ-साफ आदेश मिलने पर काम करे, और तीसरा जो लाख समझाओ, फिर भी काम अटकाए रहे। मुझे लगता है, आज प्रधानमंत्री के पास पहली श्रेणी वालों की बहुत कमी है। ज़्यादातर अमला दूसरी या तीसरी श्रेणी में है। जब नेता अकेला देश के अंदर और बाहर के दुश्मनों से लड़ रहा है, और उसके अपने लोग उसके इशारे नहीं समझ पा रहे, तो चीजें धीमी पड़ जाती हैं। ये विडंबना है-बाहर की लड़ाई में तो हम मज़बूत दिख रहे हैं, पर अपने घर के संगठन में तालमेल की कमी है।
पाकिस्तान के खिलाफ बदली नीति-'मेंढक और उबलते पानी' वाली रणनीति
बात अगर पाकिस्तान की करें, तो इस बार भारत ने कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। उसने 'मेंढक और उबलते पानी' वाली रणनीति अपनाई है। धीरे-धीरे तापमान बढ़ाओ, ताकि दुश्मन को पता ही न चले कि वह पक रहा है।
'सिंधु जल समझौते' को स्थगित करना, ऑपरेशन सिंधूर को 'खत्म' न कहकर 'स्थगित' कहना ये संकेत हैं कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया नहीं करता, बल्कि प्लान करता है। 'खून और पानी' साथ नहीं बह सकते- यह सीधा-सीधा एलान है। पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी बात नहीं रख पा रहा, उसकी अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर है, और वह अपने ही जाल में उलझा है। बिना बड़ा युद्ध छेड़े दुश्मन को घुटनों पर लाना यह असली कला है।
विरोधियों ने खुद उतारे नकाब
और सबसे मज़ेदार बात तो ये हुई कि जैसे ही मोदी ने लाल किले से 'मानसिक नक्सल' कहा, वैसे ही जितने भी असली 'नक्सली दिमाग' वाले थे, वे अपनी मांद से बाहर निकल आए। उन्होंने विरोध करना शुरू कर दिया, सरकार पर हमला बोल दिया। लेकिन उन्हें ये नहीं पता कि वे विरोध करके अपने नकाब उतार रहे हैं।
जरासंध की तरह जिसे कृष्ण ने सत्रह बार हराकर छोड़ दिया, ताकि सारे दुष्ट राजा एक जगह इकट्ठा हो जाएँ और फिर एक साथ सफाए हो जाएँ यहाँ भी वही हो रहा है। 15 अगस्त के दिन ही कुछ लोगों ने 'वंदे मातरम' और राष्ट्रगान के बीच बाधा डाली, जो कि कानूनी तौर पर तीन साल की सज़ा वाला जुर्म है। उन्होंने खुद ही अपनी पोल खोल दी। सरकार को अब इनके खिलाफ कार्रवाई करने का पूरा अधिकार और सबूत दोनों मिल गए हैं।
विचार तो बहुत बड़ा है अब उसे जमीन पर उतारना है
लेकिन, जितना शानदार नैरेटिव है, उतना ही भारी सिस्टम है जिसे संभालना है। जब तक प्रशासनिक ढाँचा इस दूरदर्शिता के साथ नहीं दौड़ता, तब तक ये केवल एक बेहतरीन भाषण ही रहेगा।
मुझे उम्मीद है कि सरकार के लोग इस इशारे को समझेंगे और धरातल पर काम करेंगे। क्योंकि विचार तो बहुत बड़ा है अब उसे जमीन पर उतारना है। देश की जनता भी इस बार पहले से कहीं ज्यादा जागरूक है। सोशल मीडिया पर लोग 'मानसिक नक्सलवाद' को लेकर बातें कर रहे हैं, उसे समझने की कोशिश कर रहे हैं। ये अच्छा संकेत है कि अब लोग केवल सुनने वाले नहीं रहे, बल्कि सवाल पूछने वाले और सोचने वाले बन गए हैं।
क्या ये सिर्फ भाषण रहेगा या इतिहास बनेगा?
खैर, ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन एक बात तो तय है इस बार लाल किले की प्राचीर ने जो कहा, वो इतिहास में दर्ज हो गया है। अब देखना ये है कि हम उसे कितना सच कर पाते हैं।
क्योंकि भाषण देना आसान है, पर उस भाषण की रूह को ज़मीन पर उतारना मुश्किल। और ये मुश्किल काम सिर्फ सरकार का नहीं, हर देशवासी का है। हर नागरिक को ये सोचना होगा कि कहीं वह तो किसी 'मानसिक नक्सल' के प्रभाव में तो नहीं आ रहा। कहीं वह तो उसी सोच का शिकार तो नहीं हो रहा जो भारत को कमतर दिखाती है।
तो चलिए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम सिर्फ झंडा लहराने वाले नहीं बनते, बल्कि उस सोच को भी लहराने वाले बनते हैं जो भारत को महान बनाती है। जो हर उस आवाज़ को पहचानती है जो भारत के खिलाफ है चाहे वो बाहर से आए या अंदर से।
जय हिंद!