क्या कामन्दकीय नीतिसार भी अंग्रेज़ी षड्यंत्र का शिकार हुआ?

मेरे गुरुदेव का एक पुराना किस्सा है। वे अक्सर कहा करते थे "बेटा, जिस ग्रंथ को तुम आज कामन्दकीय नीतिसार के नाम से पढ़ रहे हो, क्या तुमने कभी पूछा कि यह तुम्हारे हाथ तक पहुँचा कैसे? किसने पहुँचाया? और जिसने पहुँचाया, उसका उद्देश्य क्या था?"

सच कहूँ तो उस समय यह सवाल मुझे बहुत अटपटा लगा। मन में आया ग्रंथ तो ग्रंथ है, संस्कृत में है, पुराना है, तो पढ़ो और आगे बढ़ो। इसमें पूछताछ की क्या ज़रूरत? पर जैसे-जैसे मैं शोध में गहरा उतरा, गुरुदेव का वह सवाल मेरे भीतर बार-बार गूँजने लगा। और आज, जब मैं उसके हर श्लोक की बारीकी से व्याख्या करता हूँ, तो मन में एक ही टीस रहती है क्या यह सचमुच वही ग्रंथ है, जो आचार्य कामन्दक ने लिखा था? या यह भी उसी खेप का हिस्सा है, जिसमें अंग्रेज़ों ने हमारी विरासत को अपनी सुविधा के मुताबिक ढालकर, काट-छाँटकर, हमें लौटाया?

अब समय आ गया है कि आँखें बंद करके किसी ग्रंथ को प्रामाणिक न मान लिया जाए। हर पांडुलिपि से, हर श्लोक से, हर अनुवाद से सवाल पूछे जाने चाहिए। क्योंकि जिस देश की ज्ञान-परंपरा को गुलाम बनाने के लिए ग्रंथों को हथियार बनाया गया, वहाँ पहला कर्तव्य यही बनता है कि हर पन्ने की प्रामाणिकता को परखा जाए। तो आइए, कामन्दकीय नीतिसार के बारे में कुछ ऐसे प्रश्न उठाते हैं, जो शायद अब तक सतह पर नहीं आए हैं। और मुझे भय है कि उनके उत्तर शायद उतने ही असहज हों, जितना हम सोच सकते हैं।

कब, किसने और किस आधार पर लिखा?

हमें बताया गया कि यह ग्रंथ आचार्य कामन्दक की रचना है जो स्वयं चाणक्य के शिष्य कहे जाते हैं। लेकिन सोचिए, चाणक्य तो भारतीय स्मृति में हर जगह मौजूद हैं, पर कामन्दक? प्राचीन भारतीय साहित्य में उनका नाम कहाँ गूँजता है? बुद्ध से लेकर कौटिल्य तक, बाणभट्ट से लेकर सोमदेवसूरि तक, किसी ने भी इस ग्रंथ को उस रूप में व्यापक रूप से उद्धृत नहीं किया, जिस रूप में वह आज हमारे सामने प्रस्तुत है।

आप कहेंगे कि यह पाँचवीं-छठी शताब्दी की रचना है। लेकिन यह तिथि किस आधार पर तय हुई? कोई पांडुलिपि मिली? कोई शिलालेख मिला? कोई मंदिर-भंडार या निजी संग्रह मिला? या फिर यह केवल एक अनुमान है, जिसे बार-बार दोहराकर हमने प्रमाण मान लिया? अगर कोई ठोस आधार नहीं है, तो फिर हम क्यों बिना प्रश्न किए सिर झुका लेते हैं?

अंग्रेज़ी प्रेस और भारतीय नीतियों का सफ़र

सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि कामन्दकीय नीतिसार का पहला प्रकाशन ठीक उसी दौर में हुआ, जब ब्रिटिश सत्ता भारतीय ग्रंथों को "संरक्षित" करने के नाम पर उन्हें संकलित कर रही थी। उन्नीसवीं सदी में रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल ने ढेरों ग्रंथ छापे मनुस्मृति भी, अर्थशास्त्र भी, और कामन्दकीय नीतिसार भी।

अब यह सवाल मुझे परेशान करता है क्यों? क्यों अचानक अंग्रेज़ों को हमारे राजनीति-दर्शन से इतनी दीवानगी हो गई? क्या यह सच्ची लगन थी, या शासन की कोई चाल? उन्होंने हमें "हमारी अपनी परंपरा" के नाम पर वह किताब थमाई, जो उनकी नज़र से छानी हुई थी, उनके अनुवाद में ढली हुई थी, और उनकी राजनीति का औज़ार बन चुकी थी।

जब मैं कामन्दकीय नीतिसार के श्लोक पढ़ता हूँ, तो कई जगह लगता है कि भाषा कुछ अजीब है बहुत सपाट, बहुत आधुनिक, जैसे किसी प्राचीन आचार्य की कलम से न निकली हो। कहीं अर्थशास्त्र की झलक है, कहीं पंचतंत्र का रंग, तो कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि किसी ने बीच में ही कुछ जोड़ दिया हो। क्या ऐसा हो सकता है?

क्या प्रक्षिप्त अंश हैं?

मनुस्मृति के मामले में तो यह बात पहले ही कही जा चुकी है कि विलियम जोन्स और वॉरेन हेस्टिंग्स ने उसमें मिलावट करवाई। लेकिन क्या हम कामन्दकीय नीतिसार के बारे में भी यह कहने का साहस जुटा सकते हैं?

एक श्लोक है "अर्थोत्सर्गेण महता लेखैश्चाप्यात्मसंहितैः" जब मैं इसका पदच्छेद करता हूँ तो मुझे लगता है कि यह भाषा पाँचवीं शताब्दी की नहीं लगती। "लेखैः" और "आत्मसंहितैः" का ढाँचा इतना व्यवस्थित है कि मन हिचकिचाता है। क्या यह श्लोक मूल में था, या बाद में किसी ने नीति को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए इसे डाल दिया?

अगर ऐसा है, तो डालने वाला कौन था? कोई भारतीय टीकाकार, या कोई अंग्रेज़ संपादक? क्या यह भी उसी रचना-प्रक्रिया का हिस्सा है पहले किसी ग्रंथ को "प्राचीन" साबित करो, फिर उसमें मनचाही बातें घुसेड़ो, और फिर उसी के सहारे पूरे समाज को दिशा दिखाओ?

कुछ सवाल जो शायद आपको भी हों

मैंने स्वयं से पाँच सवाल पूछे हैं, और मुझे लगता है कि हर गंभीर पाठक को ये पूछने चाहिए:

  1. क्या आज कामन्दकीय नीतिसार की कोई प्राचीन हस्तलिखित प्रति उपलब्ध है? अगर है, तो कहाँ है और किस हालत में है?
  2. अगर यह सचमुच पाँचवीं-छठी शताब्दी का ग्रंथ है, तो चीनी यात्री ह्वेन सांग, फ़ाह्यान या इ-त्सिंग ने इसका ज़िक्र क्यों नहीं किया?
  3. अगर कामन्दक चाणक्य के शिष्य या अनुयायी थे, तो चाणक्य कालीन या उनके ठीक बाद के अन्य समकालीन ग्रंथों में कामन्दक का स्पष्ट उल्लेख क्यों नहीं मिलता?
  4. क्या इसका कोई संस्करण किसी भारतीय भाषा में छपने से पहले अंग्रेज़ी में छपा था? और अगर हाँ, तो किसने और क्यों?
  5. क्या इसकी भाषा और शैली सचमुच पाँचवीं शताब्दी की संस्कृत से मेल खाती है, या वह बहुत बाद की है?

ये सवाल इसलिए ज़रूरी हैं, क्योंकि आज यह ग्रंथ केवल एक ग्रंथ नहीं रह गया है। राजनीति के विद्यार्थी इसे पढ़ रहे हैं, प्रबंधन के पाठ्यक्रमों में इसके श्लोक उद्धृत किए जा रहे हैं, और सोशल मीडिया पर इसे "प्राचीन भारतीय कूटनीति" का प्रमाण बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। अगर यह ग्रंथ ही मिलावटी है, तो हम किसका प्रमाण दे रहे हैं? और अगर यह प्रामाणिक है, तो हम इसकी प्रामाणिकता साबित करने से क्यों कतराते हैं?

क्या हम केवल रोमांच के लिए पढ़ रहे हैं?

मैं जब इसके श्लोक 68 की व्याख्या करता हूँ, तो मुझे आनंद आता है उसमें कूटनीति की गहरी समझ है, यह सच है। लेकिन इतना ही सच यह भी है कि अगर वह श्लोक ही प्रक्षिप्त निकला, तो मेरा वह आनंद केवल एक भ्रम है। और मैं अपने पाठकों को भ्रम में नहीं डाल सकता।

प्राचीन भारत में ग्रंथ कभी केवल पढ़ने के लिए नहीं होते थे वे याद किए जाते थे, सुने जाते थे, दोहराए जाते थे। अगर कामन्दकीय नीतिसार वास्तव में कोई चर्चित ग्रंथ होता, तो उसकी पांडुलिपियाँ देश के हर कोने में मिलतीं, जैसे वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत की मिलती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। तो क्या हम यह मान लें कि यह ग्रंथ किसी एक पुस्तकालय में कैद था, और अंग्रेज़ों ने उसे "खोज" निकाला?

एक आग्रह सरकार से, संस्थानों से और आपसे

मैं संस्कृति मंत्रालय, ICHR, ICSSR और हर गंभीर शोधार्थी से यह निवेदन करता हूँ कि इस विषय पर कुछ ठोस कदम उठाए जाएँ:

  • देशभर के मठों, मंदिरों, निजी पुस्तकालयों और गुरुकुलों में कामन्दकीय नीतिसार की किसी भी प्राचीन प्रति की खोज कराई जाए। अगर प्रति मिले, तो उसका भाषायी और शैलीगत विश्लेषण हो।
  • ब्रिटिश अभिलेखों को खोला जाए रॉयल एशियाटिक सोसायटी, इंडिया ऑफ़िस लाइब्रेरी और ब्रिटिश लाइब्रेरी में जो भी दस्तावेज़ हों, उन्हें सार्वजनिक किया जाए। यह देखा जाए कि उन्नीसवीं सदी में इस ग्रंथ का पहला प्रकाशन किसने, कब और किन परिस्थितियों में किया।
  • आज जो भी संस्करण प्रचलित हैं, उनकी तुलना कराई जाए। क्या सभी में श्लोकों की संख्या, क्रम और भाषा एक जैसी है? अगर नहीं, तो किसे आधार माना जाए और क्यों?
  • जो श्लोक दूसरे ग्रंथों से मिलते हों, या जिनकी भाषा शेष ग्रंथ से भिन्न हो, उन्हें चिह्नित किया जाए।
  • और जब तक पूरी जाँच न हो, कामन्दकीय नीतिसार के श्लोकों को उद्धृत करते समय यह स्पष्ट लिखा जाए कि "प्रचलित संस्करण" के अनुसार, जिस पर शोध जारी है। किसी भी श्लोक को बिना पड़ताल के "प्राचीन भारतीय दर्शन" का अंतिम सत्य घोषित न किया जाए।

असहज सत्य की ओर

मुझे पता है, यह सब लिखना आसान नहीं है। जिस ग्रंथ को हमने वर्षों तक पढ़ा, उसी पर सवाल उठाना आत्म-आलोचना है, और आत्म-आलोचना हमेशा दर्द देती है। लेकिन सत्य की खोज में यह पहला कदम है।

गुरुदेव कहते थे "जो अपनी पढ़ी हुई बात पर सवाल नहीं उठाता, वह विद्वान नहीं, महज़ पाठक है।" मैं आपसे यही कहना चाहता हूँ केवल पाठक मत बनिए। जो भी ग्रंथ पढ़ें, उसका सफ़र जानिए वह कहाँ से आया, किसके हाथों से गुज़रा, और हम तक पहुँचने से पहले उस पर क्या बीती।

कामन्दकीय नीतिसार का श्लोक 68 सिखाता है कि लिखित शब्द कितना शक्तिशाली हो सकता है। लेकिन अगर वही लिखित शब्द किसी साज़िश का हिस्सा हो, तो वह उतना ही विनाशकारी भी हो सकता है। इसलिए उन सभी लिखित शब्दों की प्रामाणिकता परखना ज़रूरी है, जो हमारे अतीत का नाम लेकर आते हैं।

शोध ही असली श्रद्धा है

कुछ कहेंगे कि प्राचीन ग्रंथों पर सवाल उठाना उनकी अवमानना है। लेकिन मैं कहता हूँ यह तो सबसे बड़ी श्रद्धा है। क्योंकि जब हम किसी ग्रंथ की प्रामाणिकता की रक्षा करते हैं, तो हम उसके मूल संदेश की रक्षा करते हैं। और जब हम मिलावट को पकड़ते हैं, तो हम उस ग्रंथ को मिलावट के कलंक से मुक्त करते हैं।

मैं चाहता हूँ कि कामन्दकीय नीतिसार को लेकर देश में एक गहरी शोध-यात्रा शुरू हो केवल विद्वानों की नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की, जो भारतीय ज्ञान-परंपरा से सच्चा लगाव रखता है। क्योंकि जो प्रेम करता है, वह प्रश्न भी करता है और जो प्रश्न करता है, वही सत्य तक पहुँचता है।

और सत्य ही इस देश की सबसे बड़ी धरोहर है।

आपसे एक ही निवेदन है इसे केवल पढ़कर मत छोड़िए। इस पर बात कीजिए, अपने विद्वान मित्रों को भेजिए, पुस्तकालयों में खंगालिए, शोध-पत्र लिखिए। अगर आपके पास कामन्दकीय नीतिसार की कोई पुरानी प्रति है, तो उसे सार्वजनिक कीजिए। यही इस देश की सच्ची सेवा होगी।

यह पोस्ट मूल रूप से My blog my thoughts पर प्रकाशित थी।
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